कविताएं

प्रतिलिपि पर पड़े हैं मेरी चंद कविताएं

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नंगा आदमी ( कहानी ) 

प्रतिलिपी पर पढ़े मेरी कहानी “नंगा आदमी” 

https://hi.pratilipi.com/story/%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%AE%E0%A5%80-Oa8gEQ4HDx2S?utm_source=android&utm_campaign=content_share

रोबोट 

रोबोट 

हम सिर्फ तब ही नहीं मर जाते, 

जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है, 

हम तब भी मर जाते है, जब 

हमारी सुक्ष्म भावनाऐं, 

संवेदनाओ से रिक्त हो जाती है, 

सुना है, 

आत्मा इक्कीस ग्राम की होती है, 

और संवेदनाऐ 

शायद आत्मा सी ही भारहीन हो, 

पर सहज ही ये, 

अपने गुरूत्व बल से जीवन को 

जीवट करती, 

आत्मा के निकलते ही शरीर ज्यों 

निष्प्राण हो जाता है, 

संवेदनाओ की रिक्तता हमें बना देती है, 

किसी वक्त के पांबद रोबोट सा, 

बिना किसी हाव-भाव के, 

अपनी दिनचर्या में व्यस्त, 

आधुनिक मशीनरी के स्वार्थ की पराकाष्ठा सा.
© हरदीप सबरवाल

अजीब बात है 


    अजीब बात है
हमारे यहाँ 

सब कुछ आम सा है, 

घरो में जब तब घुस कर कोई वर्दी वाला,

नहीं लेने लगता तलाशी 

और ना ही हमारे घर की औरतो की अल्मारीयों से 

उनके अधोवस्त्र निकाल कर 

उन्हे दीवारो की खूँटीयों पर टांग कर 

अपमानित करता है, 

हमारे खेतो में 

जब तब नही गिरते 

आसमान से गोले या जिंदा बंब 

और ना ही हमारे जिंदा बच्चे 

किसी जिंदा बंब को छूकर मर जाते है, 

या बीज देते है वो कोई ऐसी फसल, 

जिनमें से बंदूके पैदा हो,

हमारे घरो में जवान हो रहे लड़को को 

यकायक सड़क पर चलते कोई 

गोली मार कर औंधे मुँह नही गिराता, 

ना ही कोई उन्हे आंतकवादी बता कर घरो से 

इस तरह नहीं ले जाता कि 

वो कभी वापस नही आते, 

पिछली सदी की बातें अब यहाँ नही घटती, 

कि हम शांतिप्रिय लोग है,

लेकिन 

हम उतनी ही शिद्दत से अपमानित किऐ जाते है 

पोलिस थानो और चोंकीयो में जब 

हम अपनी जब तब अपमानित हुई किसी बेटी 

के लिऐ इंसाफ ढूंढने जाते है और 

उतनी ही निर्लज्जता से चरित्र हनन होते है हमारी बेटियों के, 

हमारे यहाँ किसान ना जाने क्या बीजते है 

कि फसल के साथ साथ कि उग जाते है 

तमाम कारण 

आत्म-हत्याओ के, 

नौकरी ढूंढने घर से निकलते हमारे यूवा 

ना जाने क्यूं साँझ ढलते ढलते 

औंधे मुँह

किसी सुने पार्क में नशे में गर्त नजर आते है, 

हम लोग तुम लोगो से अलग है 

कि हम शांतिप्रिय है 

पर हम भी जाने क्यों हर पल 

डरे सहमे से रहते है, तुम्हारी तरह 

अनजानी आंशकाओ से घिरे 

अजीब बात है!
© हरदीप सबरवाल  

वर्जिन- बेबाक और बेलगाम कविताऐं 

वर्जिन- बेबाक और बेलगाम कविताऐ 

  ललित कुमार मिश्र का कविता संग्रह वर्जिन बेबाक कविताओ का एक संग्रह है और हिंदी के उन पाठको को थोड़ा असहज कर सकता है जो हिंदी कविता में सिर्फ नजाकत या शालीनता पढ़ने के आदि है, संग्रह की कविताऐ बेबाक और बेलगाम तो है ही समाज के वीभत्स सच भी उसी ढंग से पेश करते है जिस ढंग से वो समाज में घट रहे है, 

वर्जिन कविता में तन की वर्जिनिटी के कथित मापदंडो की बजाए मन की वर्जिनिटी की बात की गई है


” एक दिन सभी स्त्रियां नग्न हो जाऐगीं” कविता में कवि नारी के प्रति समाज में घट रही घटनाओ के बारे में कहता है अगर पुरूष की नंगी सोच की विकृति यूं ही जारी रही तो सच में एक दिन सभी स्त्रिया नग्न ही हो जाऐगीं, इसी तरह एक अन्य कविता में प्रेम जिसे हिंदी कविताओ में आजतक सिर्फ कोमल भावना के तौर पर देखा गया है पर प्रश्न उठाया गया है, एक स्त्री से पूछा गया है कि क्या वाकई उसका प्रेमी उससे प्यार करता है या सिर्फ उसके यौनांगों से ? क्या बिना यौनांगों के वो उसे स्वीकार करेगा, 

      लिंग-भेद , नारी विमर्श, यौन कुंठाओ, धर्म तथा कथित सामाजिक विडंबनाओ पर खुलकर  कहती ये कविताऐ अपने आप में कुछ अनूठी है और पढ़ने वाले को झिंझोड़ती भी है….
कविता संग्रह – वर्जिन 

लेखक- ललित नारायण मिश्र 

पृष्ठ – १२७ 

प्रकाशक – वर्जिन साहित्य पीठ 

कितने सुरक्षित है हम 


   कितने सुरक्षित है हम ?
अपने आसपास जब मैं सौहार्दपूर्ण माहौल देखता हूं तो मुझे लगता है कि हम लोग कितने अच्छे वातावरण और समाज में जी रहे हैं सब लोग शालीन और सभ्य है, पर अचानक जब TV पर समाचार देखे हुए हजारों-हजार अपराधों की खबरें, बलात्कार और लूट-डकैती, हत्या के मामले सामने आते हैं तो लगता है कि क्या वाकई हम लोग सच में सुरक्षित हैं?. 

       इन दिनों छाए हुए उन्नाव और कठुआ के बलात्कार कांड और उन पर सरकार और राजनीतिक पार्टीयो के साथ-साथ कुछ सामीजिक संगठनो की प्रतिक्रियाऐ पूपी मानवता को शर्मसार या इससे भी कोई और अधिक शर्मिदगीं व्यक्त करने वाला शब्द हो  इस प्रकरण के लिए तो वह भी शायद कम हो.  

     भारत जैसे देश में ये एक विडंबना है जहां पर हम लोग पुलिस को सामने देखकर असुरक्षित महसूस करते हैं, जो पुलिस हमारी रक्षा के लिए बनी है उसे देख कर हम इतना असुरक्षित महसूस क्यों करते हैं? सड़क पर अगर आप गाड़ी पर जा रहे हैं आपके गाड़ी के तमाम कागज-पत्र भी पूरी हो और आप बिना कोई गलती के भी जा रहे हैं तभी अचानक सामने से अगर रेड लाइट पर कोई पुलिस वाला आपको हाथ दे तो आप एकदम असुरक्षित महसूस करना शुरू कर देंगे, घर में चोरी हो जाए और पुलिस तहकीकात करने के लिए आए तो ज्यादातर मामलो में वे आपसे इस तरह बात करती है कि जैसे अपने घर में चोरी करवा ( ऐसा पोलिस का नजरिया होता है ) के आप ने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है . यह हमारी व्यवस्था का एक सबसे नाकारा पहलू है. हमारे देश में अपराधिक प्रवृति के व्यक्ति २-४% ही होगें पर व्यवस्था के इस नकारेपन की वजह से वे बाकि के सभ्य समाज के ९६-९८% व्यक्तियों पर भारी पड़ रहे है.

           पर आज पाश की कविता सबसे खतरनाक होता है को याद करते हुऐ मुझे लगता है कि हम सबसे खतरनाक युग में आ पहुंचे है क्योंकि मुझे लगता है कि सबसे खतरनाक युग होता है जब हम अपराध पर प्रतिक्रिया देने से पहले अपराधी के धर्म और जाति को देखते है, उन्नाव और कठुआ में जो कुछ हुआ इन दिल दहलाने वाली घटनाओ में भी धर्म और जाति देख रहे है! 

क्या दुनियां में कोई धर्म या कोई जाति ऐसी है जिसमें अपराधी ना हो? क्या कोई मुझे ऐसे धर्म या जाति का नाम बता सकता है जिसमें सभी लोग निरअपराध हो.अपराधी का ना कोई धर्म होता हा ना कोई जाति, वह सिर्फ एक अपराधी होता है, अगर यह बात हम नहीं समझ पाऐ तो सच में सबसे खतरनाक बात होगी.

      अगर अब भी भारत के लोग ना चेते तो इस देश को सीरीया या अफगानिस्तान बनने से कोई नही रोक सकता…..
© हरदीप सबरवाल

Desire

Desire 
 When you were leaving for a unique desire,

The spirit of my normal wish, drooped

Under the clumsyness of my skin,

In an era of whist, when emotions remain

Coiled, or like a barren womb,

A paralyzed cloud of feeling could not

Shed love on unsound reason,

Yes, I am insipid in my intoxicated nature,

Who shed voluptuousness of its skin,

In utter disgust and in search of truth,

And truth was always my El-dorado,

Ocean, I took you to merge myself,

Compose me and give me rhythm,

I am a mad in my composition, as

My unique desire is my normal wish.

© Hardeep Sabharwal
( pic from google)